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धर्मशाला। हिमाचल की राजनीति में लंबे समय तक अपनी अलग पहचान बनाने वाले मेजर विजय सिंह मनकोटिया का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव तियारा में कर दिया गया। बैंड-बाजे के साथ निकली उनकी अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग शामिल हुए। अपने नेता को आखिरी बार विदा करने पहुंचे लोगों के बीच माहौल बेहद भावुक रहा।मेजर मनकोटिया के बेटा और बेटी विदेश में थे। दोनों के गांव पहुंचने के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू की गई। कुछ समय तक पार्थिव देह को घर पर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। इसके बाद अंतिम यात्रा श्मशानघाट के लिए रवाना हुई। अंतिम संस्कार के दौरान बेटे ने पिता की चिता को मुखाग्नि दी। इसके साथ ही मेजर विजय सिंह मनकोटिया का अंतिम सफर पूरा हुआ और वह पंचतत्व में विलीन हो गए।

तियारा में उमड़ी भीड़
मेजर मनकोटिया की अंतिम यात्रा में स्थानीय लोगों के अलावा कांगड़ा और प्रदेश के दूसरे हिस्सों से पहुंचे पूर्व सैनिक भी शामिल हुए। लोगों ने नम आंखों से उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनके सम्मान में तियारा बाजार भी बंद रहा। अंतिम यात्रा के दौरान पूरे क्षेत्र में शोक का माहौल देखने को मिला।

सेना से शुरू हुआ सफर राजनीति तक पहुंचा
मेजर विजय सिंह मनकोटिया का सार्वजनिक जीवन काफी लंबा रहा। राजनीति में आने से पहले वह भारतीय सेना में अधिकारी थे। सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वर्ष 1982 में शाहपुर से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीतना उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत बनी। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दलों के टिकट पर चुनाव लड़ा और शाहपुर से कुल पांच बार विधानसभा पहुंचे।

दो बार संभाली मंत्री पद की जिम्मेदारी
मेजर मनकोटिया वर्ष 1995 और 2003 में हिमाचल सरकार में मंत्री रहे। उनके पास पर्यटन, नागरिक उड्डयन और कानून जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी रही। वह हिमाचल पर्यटन विकास निगम के उपाध्यक्ष भी रह चुके थे। उनकी राजनीति का अंदाज बेबाक रहा और कई मुद्दों पर उनके बयान प्रदेश की सियासत में चर्चा का विषय बनते रहे।

राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी रही सुर्खियों में
मेजर मनकोटिया का पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ राजनीतिक मतभेदों का दौर भी हिमाचल की राजनीति में काफी चर्चित रहा। वहीं शाहपुर में पूर्व मंत्री सरवीण चौधरी के साथ उनका चुनावी मुकाबला भी लंबे समय तक सुर्खियों में रहा। 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में सरवीण चौधरी ने उन्हें शिकस्त दी थी। वर्ष 2017 में मनकोटिया निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे थे। मेजर विजय सिंह मनकोटिया के निधन के साथ हिमाचल की राजनीति का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसमें सैन्य पृष्ठभूमि, बेबाक राजनीतिक तेवर और लंबे सार्वजनिक जीवन की अलग छाप रही।

By admin

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